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सोमवार, 10 अक्तूबर 2011


आंख नम है उस शख्स के लिये जिसे गजल जहाँ का सूरज कहना गलत ना होगा और ये याद आया चिट्ठि ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गये एक दर्द मे मिठास घोलने की कला जगजीत जी की आवाज मे बखूबी थी एक और उनकी गजल ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी लेलो भले छीन लो मुझसे मेरी मगर मुझको लौटा दो वो कागज कि कशति वो बारिष का पानी इस गीत मे जब इनके सुर पड़े तो ये जीँवत हो उठा और हर एक को अपना बचपन याद आ गया जँहा फिल्म लाइन दिखावटी समझी जाती रही है वहाँ इस शख्स ने यथार्थ गढ दिया और देश ही नही अपितु विदेशियो को भी भारतिय संगीत का गुलाम बना दिया ये कभी भुलाया ना जायेगा उस गीत की तरह होँठो से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो क्या हिँदू क्या मुसलमान क्या सिख क्या धर्म सबको सम्मान ही दिया हे राम भी गाया और सतनाम श्री वाहे गुरू भी और तो और उसने वो बात भी कही जो उसकी देशभक्ति उजागर करती है जगजीत जी ने एक बार कहा था पाकिस्तानी गायको को भारत नही आना चाहीये लेकिन दरियादिली भी क्या खूब आड़े वक्त मे भी गजलकारो का साथ दिया ऐसे दरियादिल गजल सम्राट को मेरा कोटी कोटी नमन आशा करता हु विधाता से अगला जन्म भी भारत भूमि पर ही हो देश को इंतेजार रहेगा अलविदा संगीत के सूर्य